कह कैसे सकते हो
By Amit Kumar
तुम कैसे कह सकते हो
बहुत मुमकिन है गलत है
नाजायज़ सा अलग है
हर रिश्ते का नाम है
ना है तो बदनाम है
तुम ये सोच रख सकते हो
पर कह कैसे सकते हो ?
वो जो सब जानते हैं
खुद को सही
औरों को चोर मानते हैं
लाइलाज हैं
खुद को ही सबका हकीम मानते हैं
इनको पागल सोच सकते हो
पर कह कैसे सकते हो ?
यक़ीनन कम दिखते हैं
वो जो मुखौटे नहीं बदलते हैं
सच्चे झूठे हो जाते हैं
और झूठे झूठों को सच बतलाते हैं
हाँ इनको गिरगिट सोच सकते हो
पर कह कैसे सकते हो ?
तुमने देखा किसमें है
इसमे उसमें सबमें है
मतलब है तो बाप है
वर्ना गधा तो पूरा समाज है
इनको चापलूस सोच सकते हो
पर कह कैसे सकते हो?
By Amit Kumar

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