कश्मीर की दास्तान
By Kanika Verma
तकल्लुफ से भरी है मेरी कहानी,
अंधेरों से ग्रस्त हैं मेरा इतिहास,
फूलों से भरा है शमशान,
जैसे- फूलों से सजी हैं मेरी वादी।
हस्ती- खेलती बच्ची थी,
अवज्ञात थी- बल्तकार, गोलियों और खंजरों सें.
जब तक मेर साथ न हुआ,
कि वही मेरा सितम हुआ,
जो मेरी बहन का हुआ,
कुछ गैरो ने किया,
कुछ अपनों ने,
पर मैंने फिर भी साहस न छोड़ा।
शिकारों का वक्त था, नूर था, उनका दौर था,
अनजान थी,
कि वह लहू और आग का भी दौर था,
और उनका परचम ऊपर था।
साहसी हूँ, पर घबराई हूँ मैं,
अल्फ़ाज़ों की बन्दी हूँ मैं,
कि हर बार अल्फाज़ कानों पर दस्तक देते,
दिल घबराता और गौहार लगाता,
सोचता- मौत का फरमान आया,
कि गोलियों का दस्ता आयाI
कहना बहुत चाहती थी,
रोना बहुत चाहती थी,
लेकिन, अल्फाज़ - शब्दों में ही उलझ कर रह गए,
कि घबराहट, शमशान में दफन होकर ही रह गए,
पीछे ही रह गए, उन गली - उन चौबारों मे,
जो मेरी वादी - मेरे कश्मीर के हिस्से थे।
फरीन पहने, पश्मीना ओड़े,
नमदा से ढके, केसर से रंगे,
मैं वादी – शहज़ादी,
मैं कशमीर की कली,
आज भी - भूमरों से बातें करती हूँ,
बागों में घूमती हूँ,
बर्फो में खेलती हूँ,
माँ वैष्णों के दर्षण करती हूँ,
मैं वादी – शहज़ादी,
आज भी अपनी जान,
अपने भारत में ही बसाती हूँI
By Kanika Verma

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