कशमकश
By Kavita Batra
बहुत कशमकश सा समां हे।
ना जाने कौन किस का यहाँ हे।
कहने को तो सब तेरे अपने हैं,
लेकिन सच म. तेरा अपना कौन हे और कहां हे ।
बहुत कशमकश सा समां हे।
सब पेसो का खेल हे , पेसा तुम्हारा ,
जरूरतें उन्की, तब ही तो तुमको सलाम हे ।
बहुत कशमकश सा समां हे।
हम तो रहे फकीर, जहां रुक गए वहां सबका हाल दिल से संभाल आए ,
जब बात हमारी आई तो न जाने वो अह्सास कहां ,किस मे ,और कहां हे ।
By Kavita Batra

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