कविताएँ
By Anisha
यहाँ, वहाँ, देखो जहाँ,
बिखरी पड़ीं दिखतीं हैं कविताएँ।
कहीं बिखरी लट में, कहीं
लहरों से टकराते तट में,
खुद को लिखती हैं कविताएँ।
कभी किसी की ज़ुल्फ़ में
कविताएँ उलझ जाती हैं,
सुंदर प्यारी नारी को
यह बहुत सताती हैं;
तभी कोई प्यार से
वह ज़ुल्फ़ें संवार दे
तो बड़े प्यार से
मान जाती हैं
यह कविताएँ।
कभी किसी वृद्धा के
झुरियों वाले हाथों में
वात्सल्य बन बैठती हैं
कुछ बूढ़ी कविताएँ।
चूल्हे पर रोटी सेंकते हुए,
कभी सिर पर हाथ रखते हुए,
उभरी नसों जैसे
उभर आती हैं
कविताएँ।
विरह में बहते अश्रुओं में
फूलों की खुशबुओं में
खिलखिलाते चेहरों में
उठती-गिरती लहरों में
माँ की गोद में
कुदरत की ओट में
जश्न-ए-हयात में
दिल की हर बात में
नाचती-फिरती
यूं ही टहलती हैं
कविताएँ।
By Anisha

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