कविता
By Ankita Pradeep
मैं कविता हूं,
ज़बान नहीं मेरी
लेकिन सुनाई देती हूं
मैं दिखाती नही देती लेकिन महसूस होती हूं,
हाल ए दिल बयान करने का जरिया हूं
कविता हूं पर सबकी कहानी बयां करती हूं
दिल से दिल तक पहुंचने की डोर हूं
अकेलेपन का शोर हूं
ठहरे पानी में लहर सी हूं
तो बारिश में तूफान हूं
रेगिस्तान में झील सी हूं
तो पहाड़ों में गूंजती आवाज भी
मैं सभी की अनोखी विशेष रचना हूं
वाल्मीकि के त्रेतायुग की रामायण
तो तुलसीदास के कलयुग की रामचरित्र मानस हूं
मैं मीरा की अमर भक्ति की गवाह
तो कबीर के दोहों की प्रेरणा प्रसार भी
मैं जीवन के हर कहानी का छोटा सार हूं
कविता हूं, फूल और कांटों का हार हूं
जो जज़्बात बयां नहीं कर सकते वो लिखते हैं
जो शब्द बयां नहीं कर सकते वो कलम बयां करते हैं
कवि से न पूछो के तुमने दुख ही क्यों लिखा
कभी खुश रहे भी हो या बस दुख ही झेला
उससे पूछना की क्या हुआ, क्या कोई अपना नहीं मिला?
तुम्हारे साथ जीने वाला अपना वो सपना नही मिला?
खुशी बयां करने का जरिया तो हूं ही
मगर दिल के बोझ को सुकून देने की आदत सी हूं
कविता हूं, कवि के रक्त में बहता जुनून और पागलपन हूं
दिल से पन्नों तक का छोटा सफर ही सही
मगर हजारों खयालों का मनका हूं
तारों के महफिल सी हूं
तो बिखरते संभलते जज़्बात के नाव सी
वहीं पन्नो पर सजकर उसी नाव की पतवार भी हूं
मैं कविता हूं, हकीकत से ख्वाब तक
और ख्वाब से फिर हकीकत का सबब भी ।
कवि हो या फौजी
लोहार हो या मौजी
सबके हसी और खुशी की किताब हूं
जो लिखता है उसको सहेज कर रखती हूं
ज़बान नहीं मेरी मगर सबको सुनाई देती हूं
मैं किसका जोश तो किसका आक्रोश हूं
किसी मां की ममता तो पिता का लाड़ हूं,
किसी गरीब की तड़प तो किसके चेहरे से हटता नकाब हूं
कभी बचपन की यादें
तो कभी उम्मीद की पतंग हूं
थोड़ा तुम भी आजमा कर देखो ए दोस्त
तुम्हारे दोस्तों से भी खास हूं
तुम्हारे खुशी को दोगुना और दुखों को बांट सकती हूं
मैं तुम्हारे हमराही और हमसफर सी खूबी रखती हूं
हिकायत-ए-कविता बस इतनी ही है
दिल से कलम और कलम से पन्नों तक की राह तय करती है
कभी चोटी तो कभी बड़ी हो जाती हूं
मैं एक दास्तान हूं जो कभी सुनाई जाती हूं तो कभी पढ़ी जाती हूं ।
By Ankita Pradeep

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