कलियुग संहार – कलकी का हुंकार
By Suvankar Dash
होनी अनहोनी को धिक्कारने आया हूं
किस्मत की ताक़त को ललकारने आया हूं
कितना सटीक है कर्मों का चिठ्ठा
मैं एक एक करम का हिसाब करने आया हूं
असंभव को संभव करने आया हूं
जो ज़ाहिर है उसे ठुकराने आया हूं
कहीं मुफ्त की खुशियां कहीं महंगी हताशा
मैं इस दोहरे संसार का भेद जानने आया हूं
कुछ राज़ सरेआम करने आया हूं
कुछ नामदारों को बदनाम करने आया हूं
अब उन्हें गिरना होगा कपट के उच्चाइयों से
जिनका दर्पण बन के मैं सामने आया हूं
सादगी के मुट्ठी में फ़रेब को दबोचने आया हूं
निर्णायक घड़ी तै करने आया हूं
नज़रें उठाओ, पहचानो मुझे
अब तक जो सच था मैं उसे बदलने आया हूं
By Suvankar Dash

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