कलियुग संघार – प्रलय तांडव
By Suvankar Dash
ज़मीं ज़मीं पिघलने दे
गगन अगन बरस ने दे
पवन मगन गरजने दे
नदी सदी बहाने दे
विशाल सागर रो पड़ा है
एक ज़िद सी लेकर वो खड़ा है
वक्त हमसे है ख़फा विनाश उसे करने दे।
विधि निधि पलटने दे नीति स्थिति बदलने दे घनघोर शोर होने दे, कठोर और होने दे काल आगे बढ़ रहा है, वश में विश्व कर रहा है अब तलक जो न हुआ आज उसे होने दे निर्वाण प्राण होने दे संग आत्मा ईश्वर को अब मिलनसार होने दे अखंड खंड हो चुका है, प्रचंड होने को रुका है जनम जनम का सिलसीला आज खत्म होने दे।
By Suvankar Dash

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