कलयुगी वामन
Updated: Dec 5, 2022
By Sandeep Rohit
किससे डरा है 'वो' जो तुझसे डरेगा
सिर पर लिए पोटली वो मटमैली, आज जो कलयुगी
वामन चला है,
देखते है मंजिल पर पहुँच कर वो कब तक थमेगा,
होती जो रोटी, अपनी माटी में भला फिर,
छोड़कर ही क्यों जाता निज धात्री को, वो कर्मवीर
मानो या ना मानो ये अदावत बस चाँद लम्हों की है
कि रफ़ता रफ़ता फलक पर छायेगा गर्द फिर से,
अपने रक्त को पिरोकर रुके पहियों के जंग को छुड़ाने,
अपनी अस्मत के एवज़ में किस्मत चमकाने ,
अपनी अस्थियों की वेदी पर सुनहरे कल के अलख को जगाने
आत्मदाह को आमादा 'वो' वामन फिर से चलेगा
किससे डरा है 'वो' जो तुझसे डरेगा…
By Sandeep Rohit

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