कल देखा था छत ले किसी को
By Shashank Kumar Sinha
कल देखा था छत पे किसी को,
चांदनी को रौशन करते हुए |
वो मुस्कुरा रहीं थीं,
जैसे कोई मुस्कुराता है
खुदा को रौशन करते हुए |
उनकी बदन की चमक थी या
चाँदनी टकरा कर लौट रहीं थीं
की मिट्टी के हर कण को
देखा था, सितारों सा चमकते हुए |
उनकी आंख थी, या
बादलों के पीछे से आती चाँदनी
की उनके कूचे की रहनुमा को
देखा खुदा से तुलना करते हुए |
उनकी लहराती जुल्फें थी, या
खुदा का पैगाम
की हवा में आयातों को
देखा उड़ते हुए |
उन्होंने मुझे पुकारा था, या
खुदा ने मुझे आवाज दी थी
की खून के एक-एक बंद को
देखा मचलते हुए |
उनकी लब थी, या
शबनम में भींगी पंखुरी
की निकलने वाली नर्म हवा को
देखा इत्र फिज़ा में बिखरते हुए |
उनका बाहों का फेलाव था, या
कलियों से बना बिस्तर
की अपने बदन पे
देखा उनके प्यार को सिहरते हुए |
By Shashank Kumar Sinha

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