कर्म और धर्म
By Deeksha Chugh Bagla
जिंदगी का भरोसा ही होता तो हर वह शक्स जो बीत गया वह शायद कुछ और होता
और तुम अभी इंतजार में होगी कब उल्फत के दो पल निकालकर अपनी मंजिल से मिलोगे ?
यह तो ना जाने कैसी इनायत है खुदा की के रहम हैँ हम पर
वरना दौर तो कुछ ऐसा है कि आने वाले पल का पता नहीं है
तो कब तक यूं ही रुके से रहोगे दर्शनाभिलाषी की तरह
जिसे सिर्फ चाहत तो है कुछ पाने की लेकिन रास्तों का पता ना हो
क्योंकि मौत नहीं देखती कि कौन किस रुत्बे के साथ जिया है
तो ए बंदे ! तू कर्म कर, तू धर्म कर ।
तू कर्म को ही अपना धर्म कर और फिर मत सोच के अंजाम क्या होगा क्योंकि सदा के लिए तो यहां कोई है ही नहीं।
By Deeksha Chugh Bagla

Comments