करुणाकांक्षी ??
By Ashish Priyadarshi
हुँ मैं श्रमिक|
श्रम धर्म मेरा,
है स्वाभिमान और कर्म मेरा|
श्रम मोल के तुम तो भूल गए|
कह प्रवासी, मेरा अपमान किया,
छत और रोटि भी छीन लिया|
अब तुम्हीं कहो क्या खाऊँ मैं?
किस तरह हाथ फैलाऊँ मैं?
मर जाऊँ, के लूँ मैं साँस भी कुछ?
हुँ लौट रहा अब गाँव मेरे|
हैं पाँव मेरे कुछ थके हुए,
काँधे भी बोझ से झुके हुए|
धर धीरज कदम बढ़ाता हुँ|
लड़ता जाता हुँ प्रकृति से भी,
गंतव्य कि प्यास पिए जाता हुँ|
है गोद मेरे एक लाश पड़ी|
अफ़सर बनना जो चाहती थी,
बिटिया मेरी अब नहीं रही|
अब लौट कहाँ पे जाऊँ मैं|
हुँ गया टूट और बिखर पड़ा,
दो रेल चढ़ा, सो जाऊँ मैं|
पर श्रम का मूल्य यही मेरा?
करुणा का भी मैं पात्र नहीं?
तो सुनो, श्रम की कोई जात नहीं|
हुँ मनुज भी मैं, तुम ध्यान धरो|
सरकार जगो, है प्रजातंत्र,
हक़ दो मेरा, इन्साफ़ करो|
हक़ दो मेरा, इन्साफ़ करो||
By Ashish Priyadarshi

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