कभी मेरे घर तुम आओ ना
By Rani Dubey
कभी मेरे घर तुम आओ ना
लोगों से बहुत कुछ सुना है तुम्हें मेरे बारे में कहते है
कभी सामने बैठकर मेरे बारे में अपनी राय सुनाओ ना
कभी मेरे घर तुम आओ ना
अरे कोई बात नहीं , मुझे तो आदत है
सफाई नहीं दूंगी मैं ,मेरे पास शब्दों की किफायत है
नजरे क्यों झुका ली तुमने ,तुम भी मुझे देखकर मुस्कुराओ ना
कभी मेरे घर तुम आओ ना
ऐसे सड़क पर तो अनजान लोग हाल खबर लिया करते हैं
तुम तो बचपन के साथी हो अपने इज्जत दार कदमों से मेरे घर की रौनक बढ़ाओ ना
कभी मेरे घर तुम आओ ना
कोई बेहिसाब किस्सों का पुलिंदा नहीं, है मेरे भीतर का इंसान अब जिंदा नहीं है
क्या कहा था तुमने कि जानता हूं वह कैसी है
उसी लहजे को अपनी बातों में एक बार फिर से दोहराओ ना
कभी मेरे घर तुम आओ ना
सुना है बहुत शरीफ हो तुम लोगों की नजर में जो आएना तुम खुद देखते हो
वह आइना मुझे भी दिखाओ ना
ऐसे चुप क्यों खड़े हो
जवाब दो बहुत ऊंची आवाजों में जो बोल रहे थे उन नियम कानून और शराफत की नसीहत
मुझे भी समझाओ ना
मुंह पर सच्चाई बोलना भी एक हुनर है
तुम यू मेरे सामने शर्माओ ना
कभी मेरे घर तुम आओ ना
By Rani Dubey

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