कौन देखता है.....?
Updated: Sep 20, 2022
By Hussan Ahmad Ghazali
रोशनी खुद में हो तो अच्छा है,
बुझी चिराग कौन देखता है।
लौ है, तो तपिश होना लाजमी है,
जाड़े में , ठंडा पानी कौन देखता है।
जब तक रवा़नी है, तू दरिया है,
थम जा ज़रा, फिर तुझे कौन पूछता है।
जब तक उंश है, मौज्जा है मेरे हमदम,
फिर हर्फ़ में हो इनायत, तो लह्ज़ा कौन देखता है।
महरुम हूं, फक्त एक दीदार को,
ऑंखें खोल, ख्वाब कौन देखता है।
फा़नी है ताबिर-ए-ग़जाली,
इसके बाद भी, मेहर-ओ-माह कौन देखता है।
By Hussan Ahmad Ghazali

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