कौन जानता हैं?
By Sanchita S K Behera
हर चेहरा यहां जाना पहचाना है,
पर ये दिल कहां हर किसी को जानता है?
ज़ख्म हैं बेहिसाब यहां,
पर मरहम लगाना कौन जानता है?
काफ़ी कैद हैं यहां, कुछ औरो में कुछ खुद में,
पर यहां आज़ाद करना कौन जानता है?
हर टूटी चीज़ यहां, फिर चाहे वो घर हो या रूह,
मरम्मत के काबिल हैं, पर मरम्मत करना कौन जानता है?
यूं तो किसी को बिखरने के सौ बहाने ढूंढ लेते हैं,
पर बिखरे हुए को यहां समेटना कौन जानता है?
गलत राहों पर जो तुम चलने लगो,
तो मंजिल तक पहुंचाना कौन जानता है?
दूरियों में तो कुछ घुट घुट कर मर रहे,
पास बिठाकर हाल सहलाना कौन जानता है?
लकीरें तो काफ़ी हैं खींची हुई,
यहां गलत लकीरें मिटाना कौन जानता है?
वास्ता तो हर कोई रखता हैं यहां मतलब से,
पर राबता रखना कौन जानता है?
हर कोई लगा हैं यहां जिस्मों के बातों में,
फिर यहां रूह से मोहब्बत करना कौन जानता है?
लबों को छूने की बात तो हर किसी ने की हैं,
पर मोहब्बत में जबी को चूमने कि बात कौन करता है?
बात करते है यहां हर कोई किसी के बाँहों में सिमट कर वक्त बिताने कि,
पर मेहताब में साथ रात बिताने की बात कौन करता है?
मजहबी इश्क तो हर कोई करता है,
पर इश्क़ को मजहब बनाना कौन जानता हैं?
शोर में और किसी के तो हर कोई हैं यहां शामिल,
तो फिर खामोशी का मज़ा यहां कौन जानता हैं?
अल्फाजों के सहारे तो हर कोई कह रहा अपनी बात,
फिर यहां खामोशी को कौन पहचानता है?
मैखानो से तो हर कोई रूबरू हैं,
आंखों की बातें यहां कौन जानता है?
बारिश में भीग तो हर कोई जाता हैं,
पर बूंदों को महसूस करना कौन जानता है?
लिहाज़ की बातें तो यहां हर कोई बताता हैं,
फिर यहां जीने जा लहज़ा कौन जानता हैं?
जिंदगी तो हर कोई गुज़ार रहा है यहां,
पर जिंदगी जीना कौन जानता है?
By Sanchita S K Behera

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