औरत का इंतजार
By Samiksha Katyayan
इस घने अंधेरे के छन्ने का इंतज़ार है,
मुझे बेख़ौफ होकर जीने का इंतज़ार है,
खड़खड़ा रही हैं बेड़ियाँ अब,
पँख उन्मुक्त उड़ने को बेकरार हैं।
सूशीलता की अपेक्षा है जिस्से ,
जल-सा मुझ औरत का आकार है।
सती से निर्भया तक का निर्मम इतिहास है जिसका,
मुझे भी तो समान जीवन का अधिकार है।
इतने छोटे कपड़े मत पहनो, शाम के पहले घर आ जाओ,
मुझे यह सुन्ने से इनकार है।
हे मर्द!
तुमको दिए ह़क का जो हिस्सा है आधा,
मुझे उस हिस्से से सरोकार है।
हाँ!
चाहती हूँ कमाना और बेलन न चलाना,
क्या यह चाहत इतनी शर्मसार है?
बस!
अब ना बँधूंगी ज़रीरों में, ना रहूँगी प्रकाश की मोहताज,
बड़ों को सम्मान और छोटों को स्नेह, अब इन तक ही सीमित मेरे संस्कार हैं।
ज़माना यह ना भूले,
हरी चूड़ियाँ पहन कर भी मैंने असुरों का किया संहार है,
रात का सहारा लेने वाले राक्षसों ,
अब छुपना बेकार है,
क्योंकि द्रुपद-कुमारी की रक्षा करने वाले,
उस गोविंद पर मुझे ऐतबार है।
आ गया है समय चुप्पी तोड़ लोगों को चुप कराने का,
क्योंकि मुझे भी बेख़ौफ होकर जीने का अधिकार है।
By Samiksha Katyayan

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