औरत औरत अच्छे दोस्त
By Kavita Batra
औरत - औरत अच्छे दोस्त नहीं हो सकती , ऐसा मैं मानती थी , जब तक तुमसे मिली नहीं थी।
कहने को अभी - अभी कुछ महीने ही हुए हैं कि हम रूबरू हुए हें, हमारे मौहल्ले को एक हुए वेसे सालों बीत गए।
चहरा तुम्हारा हमेशा खिलखिलाहट से ही दिखता हे, और चहरे कि चमक से रोशन करती हो हमारी मुलाकात को, मानो कितने अपने अरमानों के कश्ती को दूबा आए ।
एक झिझक, सी थी की दोस्ती का सफर शूरू करूं या नहीं , दिमाग और दिल की कशमकश में ,हम अपने दिल की सुन आए।
सुभ प्रभात से शुरू हुआ और अब दिल के जज्बात का शहर हम तेरे सामने रख आए।
सुबह कि चाय के साथ , सुबह कि पहली किरण, कुछ दिल की बातों का सिलसिले , हम अपनी दोस्ती कि शुरुआत कर आए ।
औरत - औरत अच्छे दोस्त नहीं हो सकती , ऐसा मैं मानती थी। जब तक तुमसे मिली नहीं थी।
By Kavita Batra

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