और थी
By Inder Raheja
वो सुरूर और था
तड़प उसकी और थी,
मदहोशी में हूं हरदम जिसकी
वो खुमारी और थी।
हम साथ थे
हमारी एक बात थी
वो दौर और था
वो उम्र और थी।
हक थे शिकायत थी
प्यार था उम्मीदें थी
वो समझौते और थे
उनकी बात और थी।
कलम की लह में
जिंदगी आसान थी
वो शब्द और थे
वो तान और थी।
एक बूंद भी ना चू पाई
सीने में भीगे बदन से
एहसासों में डूबी
वो बरसात और थी।
मेरी चिंता थी जिनमें
मेरे फायदे की बात थी
नाराजगी वो और थी
वो आनागानी और थी।
हम दिवाने शौकिया तब
नौसीखिओ सी भूल हुई
फितूर वरना और होता
बेकरारी वो और थी।
काजल के कालेपन को
नज़र अब क्या लगे
शर्म उनमें और थी
वो आंखे और थी।
महक पलको पर दस्तक थी
खींच लाए ध्यान मग्न से
उस आवाज की पहचान थी
वो पुकार और थी।
सपनो का चेहरा था
सपनो में वो चेहरा था
वो नूर और था
चमक उसकी और थी।
By Inder Raheja

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