ओस की बूंदें
By Dr Meenakshi Saini
देखा है कभी, ओस की बूंदों को, पत्तों पर गिरते हुए,,?
कैसे नाचती हैं ना वो, बहुत ही झूमते हुए?
मोती सी लगती हैं, वो सब एक कतार में,,
दिल करता है, पिरो लूं सबको ,
अपने गले के हार में।
नहला जाती हैं पत्तों को, एक मां की तरह,,
और झूल जाती हैं फिर उन्हीं पर,
छोटे बच्चों की तरह।
चमक उठती हैं सभी ,धूप की रोशनी पड़ते ही,,
और कभी तेज़ हवा के झोंके से,
सब लहरा जाती हैं।
हम सबकी ज़िन्दगी भी, हरे- भरे पत्तों जैसी है,,
जिसमें, ओस की बूंदों जैसे पल,, अपना कमाल दिखा जाते हैं।
कभी खुशी के पलों में, ये बहुत चमक उठते हैं,,
तो कभी दुख के क्षणों में, आंखों को, बहा जाते हैं।
मस्ती के पलों में तो, ये बहुत झूमकर नाचते हैं,,
लेकिन दुनिया की बेरुखी से,
कभी दिल भी भर जाते हैं।
कुछ भी हो, कैसा भी हो, जो भी हो,,
जब भी ओस की बूंदों जैसे ये पल,
आकर के वापिस जाते हैं,,
तो अपने साथ, सब दुख दर्द ले जाकर,,
हमें ज़िन्दगी का, और भी स्पष्ट,
दृष्टिकोण दिखा जाते हैं।
ओस की बूंदें, पत्तों पर हों, या ज़िन्दगी में पलों जैसी,,
ये हमें जीने का सलीका, बहुत ही सही से बताती हैं।
समेट लो, और खुल कर जी लो, ज़िन्दगी के हर पल को ,,
क्योंकि, ये ओस जैसे पल, पल में ही फिसल जाते हैं,,
कभी भी, किसी के हाथ नहीं आते,,
कभी भी ये , फिर हाथ नहीं आते हैं।।
By Dr Meenakshi Saini

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