ओ गोरी
By Amit Sagar
लटकत-मटकत इस जंगल में यूँ इठलाती फिरती हो,
ओ गोरी क्यों नैनन के तुम बाण चलाती फिरती हो |
तेरा यौवन देख पतझड़ को भी, सावन सा आभास हुआ,
आज सुबह से बरस रहा मेघ, ना रुकने का एहसास हुआ I
क्यों तुम हम भोले-भालो पर अपना बल दिखलाती फिरती हो,
ओ गोरी क्यों नैनन के तुम बाण चलाती फिरती हो |
By Amit Sagar

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