एहतियातन
By Surya Kant Pawar
एहतियातन जला सा रहता हूँ मैं,
बुझने लगूंगा तो लोग उदासी का सबब पूंछेंगे।
बातों बातों में तेरे नाम के तंज कसे जायेंगे,
किस्सों किस्सों में तेरे नाम पे रंज धरे जायेंगे।
एहतियातन जला सा रहता हूँ मैं,
बुझने लगूंगा तो लौ डबडबा न उठे शायद,
की ख्वाबों के मोती जो जूनून में इन आँखों ने पिरोये थे,
पलकें भारी हो चली हैं उन मोतियों से आजकल।
एहतियातन जलता ही रहूँगा मैं,
बुझने लगूंगा तो तेरी याद में राख ना हो जाऊँ मैं।
कि बातें, वो रातें, वो महरम, वो वादे,
जो किसी से छुपे ना थे, अब उनसे ही हमारी परदादारी है।
By Surya Kant Pawar

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