एक सिपाही
By Krishna Mahana
मौत के कफ़न का नहीं खौफ उसे, जीत ही आदत है मात की नहीं शौख जिसे ,
देख सिना तान पर्वत सा है वो खड़ा, हिंदुस्तान के शान ना घटे ये ज़िद पर है वो अड़ा ।।
तलवार और बंदूक की क्या जरूरत, जब नसों में खून हो प्रताप और शिवाजी जैसे वीरों का,
सीने में चाहे वो गोली खा के आयेगा, पिठ ना दिखाएगा क्योंकि कलेजा है शेरों सा ।।
देख पत्थर सा जिगर है उसका जो अपनी माँ को भुलाता है, पूछो जो माँ का नाम भारत माता बताता है,
त्याग का उदाहरण है वो सिपाही, जो रिश्तों से मुँह मोड़ आख़िर में शहीद कहलाता है ।।
वो देश को दिया वादा निभाने के लिए खुद राख सा हो जाता है,
ये भारतीय सेना है जनाब खुद के लिए कहाँ ये देश के लिए ही जीता है ।।
ना जाने कितनी रात ना सोए वो आख़िर में सुकून की साँस लेता है,
कौन कहता है तिरंगा के तीन रंग होते है , वो लहू का क्या जो उसके ही शान के लिए बहता है ।।
जब जंग के बाद तिरंगा लहराता है जीत का जशन जब पूरा हिंदुस्तान मनाता है,
शहीद बेट्टे की बलिदान में वो घर भी जीत की दिया जलाता है ।।
जा पूछ आ वो हमारे झंडे से झुकता ना होगा कभी जब हाथ में वो थाम ले आज भी,
जा पूछ आ वो गोली से सीने से उसकी जब गुज़रती होगी रोती होगी सायद वो भी ।।
जा पूछ आ वो रूह से जो अपनों से मिलने के लिए तरस गई, आँख मूंद के भी वो बारिश सी बरश गई,
जा पूछ आ वो पैगाम से जो कुछ आधी सी रह गई, नीली थी स्याही जो कभी ना जाने कब लाली सी बह गई ।।
ना होती नफरत प्यार ही होता अगर, ना बिछड़ता वो बाप से उसका बेटा ना रहती वो माँ की आँख नम,
ना होता जंग ना होती लड़ाई अगर, आज भी हाथ उस पिता का अपने बच्चों पे रहता, ना होती वो स्त्री की शृंगार में लाली कम ।।
मुल्क-मुल्क में नफरत है भरा, वो सिपाही बंदूक लिए बैचेन आज भी क्यों है खड़ा,
इंसान हो के इंसानों के दुश्मन हो,जात पात से बंट चुके तो जिस्म में आज भी क्यों लहू लाल रंग से ही है दौड़ा ।।
By Krishna Mahana

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