एक वेश्या
By Abhishek Kumar 'Shahi'
गुजरा आवारा हवाओं संग इक्तिफाकन मैं भी तेरी गलियों से।
जहाँ दरबार सजाया है काँटो का तूने महकती कलियों से।
बेचैन ढलती शाम की ख़िदमत में पेश तेरा नजराना है।
तेरी दावत में शामिल शहर का हर एक शरीफ घराना है।
जिधर निगाहें फेरी तूने समा गई उस दिल में।
बेच कर ईमान कमाया था जिसे , उड़ा वो नोट तेरी महफ़िल में।।
हर शराफत को तूने क्या खूब परखा-पहचाना है।
कितनी शीशी टूटी शराब की क्या कोई पैमाना है ??
सुना है तेरे नशे का हर कोई यहाँ दीवाना है।
जिश्म है तेरा या फिर कोई मैखाना है!
कितनों को तृप्त तूने , कितनों की प्यास बुझाई है।
कितने मचलते ख्वाबों ने आकर तुझपर ली अँगड़ाई है।।
यौवन के आवारापन को खेती तू एक कश्ती है।
तेरी एक झलक पाने को कुँवारी आँख तरसती है।।
फिर भी न जाने जमाने को भला क्या तुझसे इर्ष्या है।
रातें बीती जिनकी बीती संग तेरे ,सुबह कहते हैं तू एक वैश्या है।।
शिद्दत से आंखे उसकी भीड़ को टटोल रही थी।
सुना खामोसी से मैंने वो हमसे ये बोल रही थी।।
पूछते हो हाल नौका का क्यों तुम मंझधार से।
हाल जानना है तो पूछो कभी पतवार से।।
सुना तूने अबतक मुझे जमाने की जुबानी है।
पर इन सबसे इतर मेरी अपनी एक कहानी है।।
बाहर से इस जीवन में दिखता जितना चहल-पहल है।
मृगतृष्णा है बस सब, ये एक वीरान मरुथल है।।
हर रात चमकती जुगनू मैं ,सुबह राहों की धूल हूँ।
खिलना है जिसे काँटो के लिए मैं वो बदनसीब फूल हूँ।।
होली के रंगों में घुली मैं बनकर पुष्प पलाश हूं।
वसंत बीता पतझड़ आयी अब मैं जिंदा लाश हूं।।
मजहब के नाम इंसानियत को जिन्होंने सरेआम नंगा किया।
पास आये मेरे दोनों साथ शाम को, सुबह जिन्होंने दंगा किया।।
तब जाना मैंने ,न हिन्दू मैं ,न मुसलमान, न सिख हूँ न ईसाई हूँ।
एक अमावस की सुहागरात मैं , ठिठुरते ठंड की मैं रजाई हूँ।।
जाती ,धर्म ,ईमान ,उसूल सब मिट जाता आकर मेरे विधान में।
जोड़ा गया है धर्मनिरपेक्ष शब्द शायद मेरे लिए ही संविधान में।
घूमते चारित्रवान बनकर जो तेरे शहर के चौबे-छब्बे हैं ।
पूछो इनके जिश्म पे मेरे काजल के कितने काले धब्बे हैं।।
औरों की नजरों को ये बेशक दे सकते धोखा है।
मेरी सिसकियों में कैद इनका पूरा लेखा-जोखा है।।
मेरा बेपर्दा होना दिखता है तुझे अपनी नग्नता दिखती नहीं।
तुम खरीददार न होते तो शहर की बेटियां बिकती नहीं।।
सात साल की मासूम थी वो उसे क्या पता जीवन क्या है।
रौंदी गयी तेरी हवस में वो भी जिसे मालूम नहीं यौवन क्या है।
पूछ जरा खुद को कभी तू कितना बीमार हुआ है।
बेजुबां जानवर तक तेरी हवस का शिकार हुआ है।।
बड़ी लंबी दास्तान है , जितना सुनोगे तेरे शहर का श्वेत दामन उतना गंदा होगा।
मेरी कहानी में हर बार कोई इलाके का इज्जतदार नंगा होगा।।
कोई पूछे तो कह देना इतना आज की शाम फिर रंगीन है।
महफ़ि सजाती है वैश्या क्यूंकि समाज चरित्रहीन है।।
By Abhishek Kumar 'Shahi'

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