एक रात कभी
Updated: Dec 14, 2022
By Vishal Raj Amaresh
रोना तुम साथ कभी,
एक रात कभी।
जब कभी अकेला बैठा तकता रहूँगा
चलते पल पल को,
जब चीखती सन्नाटो में दिख जाए वो
कल के दृस्य अनगढ़ तो,
जब मौन बिंधे स्वर-मन-आँगन में तेरे पैर
की आहट थिरके,
और हर अंग-उर्मि के सघन-वन तड़पे तुझ
वातास के हिलकोरो को
जब नैनों पर भान चढ़े तेरे सतरंगी रंग के
सकल कोमल पथ
और इसी रुपहली धुंध के साये जब भरमाये
कि तुम आए हो
हर प्राण-तरंग फिर ज्वार निहंग बन उछले
तुझ पूनम को छू लेने को
और छू पाए न जब
तब पीर अंतर का सायास रीता बन निर्झर के
पानी सा
प्रथम वेग का स्वप्न विच्छंद हो जब पत्थर पर
गिर जाएगा
और सत्य का सहभार सकल पल में मुझसे
छिन जाए कभी
तुम रोना साथ कभी
उस रात कभी
कल्पना भीते रंगमंचों पर जीवन के
कई किरदार दिखे जब
प्रशस्त हो अगणित प्रमाण व्याकुल कुंठित
हर श्वास दिखे जब
एकल का आभार सुशोभित कर जब मेरे
मन का तम-हिरणी डोले
और नीरवता के प्रतिमान अनंत गढ़ बैठे
लोग मुझे जब हारा बोले
तेरे अंकित नव-पल्लव-कोंपल पर जब
मेरे हाथ कि लकीरें अटके
कौतूहल के रस में प्राणों से टप-टप कर
सब तेरी आँखे टपके
तब केवल रम गया जो होगा
तेरे पानी से टूटे चेहरे में
एक ज्वाल भेद चक्रयवीयूह जग का
अस्तित्व-समिधा के पहरे में
प्रारब्ध के अंतिम विलय पर
तब तुझ पूरक कि आस तके
और उलटे सधे नियति के बंध से
खुले न जब कोई साधन कभी
रोना तुम साथ कभी
एक रात कभी
उस रात कभी
By Vishal Raj Amaresh

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