एक युग की निवृत्ती
By Anand Mohan Jha
वह कुर्सी तेरे बिना आज सुनी सुनी सी है।
लेकिन कल बुझे मन से किसी और की हो जायेगी।
तेरे अधीन काम करे वो सारे कर्मचारियों और सहकर्मियों
हमेशा ही तुझे सर या झा साहब बोल सलाम नमस्ते करेंगे।
कोयले की हर खान तेरे आगे नतमस्त होंगे।
वो सर्दियों की रात में भी दफ्तर से एक कॉल आते ही बीच रात तेरा चले जाना।
कई बार दिन भर भूके प्यासे काम में लगे रहना।
वॉकी टॉकी द्वारा खाना खाते समय भी सबसे सामंजस्य बनाए रखना।
सोमवार से रविवार हर दिन पूरे साल बिना रुके काम करना।
बेटे को कंधों पर उसके बचपन में हर रोज घुमाना।
बेटे का आदर्श बन उसे अपने जैसा कर्मठ बनाना।
दफ्तर और कॉलोनी में हर किसी को अपना परिवार बना लेना।
अपने हर सहकर्मी के सुख दुख मे बराबर शामिल होना।
होली में रंगो में हर साल सबके साथ घुल जाना।
वो सर्दियों की रातों में अक्सर अंगीठी अलाव के आगे बैठ कर पूरी कॉलोनी का वो गपशप कर खाना खाना।
वो रामगढ़ से गाड़ी में कॉलोनी आते हुए शेरो या हिरणों का दिखना जैसे आम सी बात थी।
लेकिन अब पिकनिक में झा साहब का परिवार नहीं होगा।
लैयो का वह अमरूद का पेड़ आज भी तेरी आस देख रहा है।
तापीन की वह बालकनी से दिखने वाले खेत एवं पहाड़ आज भी तेरी एक झलक को बेचैन हैं।
रांची का वह घर आज भी तेरे पदार्पण के लिए वंचित है।
दुधिचुआ आवास तेरे जाते ही सुना हो जायेगा।
बसख सर और आलम सर आज भी तूझे याद करते होंगे।
कोयले की खानो में तुझ जैसे हीरे कम ही होंगे।
बदलते दौर के साथ हर मशीन और कंप्यूटर पर महारथ हासिल कर लेना।
महारत्न कोल इंडिया के सबसे अनमोल रत्नों में मेरे पिताजी सदा रहेंगे।
By Anand Mohan Jha

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