एक बारिश की शाम/ A Rainy Evening
By Vidit Panchal
वो एक बारिश की शाम, जब मैं बस जाने को हुआ और तुमने रोका था सहसा मुझको और कहा था मैंने बेकस, "बस,वक़्त हुआ अब चलता हूँ"। तुमने नहीं कहा था फिर कुछ हमने एक-दूजे को देखा था तुमने कस कर पीठ को मेरी खींचा था अपनी ओर जकड़ कर, नाखून तुम्हारे गुद ही गये थे
तब से मेरी पीठ में ऐसे जैसे कोई बात तुम्हारी उतरी हो सीधे दिल में, और रह-रहकर अपने ज़ख्मों में मुझे नोचती हो हरदम मानो, एक बारिश की शाम तुम्हारी मेरे पास उधार रखी है। आकर देखो, उन ज़ख्मों से निकली हैं बेलें कई बारिशों के बाद उन बेलों पर कुछ फूल आये हैं। By Vidit Panchal

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