एक बाग़ी कि ज़ुबानी
By Suvankar Dash
डर के जीना मौत है मर मर के ये जीना भी क्या
सीने में ये चुभन को लेके दर बदर फिरना भी क्या
लाई है आज वक्त हमको खींच कर इस मोड़ पर
अब नहीं तो बाद में जज़्बात ये दिखलाना क्या
आई है अब वो घड़ी क्यों है नही तैयार हम
हिम्मत का हमकोहै वादा अब बढ़ने ही दे ये कदम
बन ने दे चिंगारी को शोला सा अब घबराना क्या
अब नहीं तो बाद में जज़्बात ये दिखलाना क्या
भींग जाने दे तू ये जिस्म को जुनून से
मुक्ति कर तु आज इसको कैद या कानून से
वजह तेरो नेक है, अंजाम से डरना भी क्या
अब नहीं तो बाद में जज़्बात ये दिखलाना क्या
तक रहे हैं चांद तारे इनको न निराश कर
संकल्प तेरा ढीठ है इसको तू एहसास कर
सामने जो है खड़ा तक ते उसे रहना भी क्या
अब नहीं तो बाद में जज़्बात ये दिखलाना क्या
By Suvankar Dash

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