एक प्रयास
By Vani Bansal
चलो आज फ़िर मिलते हैं, गुलाब के फ़ूलों की तरह कांटों के बीच खिलते हैं
मुश्किलों से झूझते हुए, पत्थरों के बीच नन्ही कलियों की तरह सूरज से मिलते हैं
बारिश की बूंदों के बीच बचपन की किलकारियों जैसे फ़िर से हँसते हैं
पट्री पर चलती हुई तेज़ रफ़्तार की ट्रेन जैसे फ़िर से दौडते हैं
हवा को काटते हुए उम्मीदों को हाथ में लिये विपरीत दिशा में फ़िर उड चलते हैं
चलो आज फ़िर मिलते हैं, सपनों की मृदुता को हकीकत की टोकरी में सम्भाल के रखते हैं
कंधों पर जीवन जानने की जिज्ञासा लिये नदी के तट तक चलते हैं
और स्पर्श करते हैं उस संघर्श की बहती गंगा को
जो जन्मों जन्मांतरों से जीवन दिये बहे चली जा रही है, अंगिनत लोगों के प्रयासों को
चलो आज फ़िर मिलते हैं, माँ के दुलार की उस घी में डूबी रोटी से
पिता की कोशिशों की उन थकान भरी मगर गर्व की आंखों से
दादी के दुलार से और नानी की उन्हीं पंचतंत्र की कहानियों से
जिनमें बस्ता है मेरा तुम्हारा और हम सबका खुल के जीने का एक प्रयास
By Vani Bansal

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