एक पहर का स्वप्न
By Anubha Sinha
घोर निद्रा में विचरण करता
देखा एक मधुर स्वप्न
आलस सारा छोड़ चुका हूं
दृढ़ प्रतिज्ञा करके जगा हूं
करूंगा मैं नित नए कार्य
मिलेगा जिससे मुझे ढ़ेरों सम्मान
मैं बना हूं दुनिया का नेतृत्वकर्ता
क्या अमेरिका, क्या यूरोप
सब की बागडोर मेरे पास
मेरे एक आदेश पर नियम बन रहे हैं
दूसरे आदेश पर नियम है रहे हैं
यू.एन.ओ का मैं महासचिव बना हूं
तब से दे रहा हूं ऑर्डर घनघोर
कोरोना के भयावह से सभी देश
अभी तक कंप-कंपा रहे हैं
पर अब होगा इसका पूर्ण समाधान
"मैं" करूंगा इसका निदान
निर्धनता दुनिया से हटा रहा हूं
बस धनवानों को बसा रहा हूं
शीश महल में सभी रहेंगे
मेवा-मिष्ठान ही खाएंगे
सभी वृक्ष मनचाहा फल
अपनी लताओं में लगा रहा है
झरनों से मीठे रस गिर रहे हैं
नदियों में दूध ही दूध बह रही है
भारत ही भारत की जय-जयकार गूंज रही है
तभी मैं झटके से जागा
खुद को चारपाई से नीचे पाया
देखा कमरे में कुछ नहीं है
भूख से पेट तड़प रहा है
गुल्लक का एक सिक्का मुझसे पूछ रहा था
इसमें रहने दोगे या
मिटाओगे अपनी भूख
परंतु मैं प्रफुल्लित बैठा, पुनः
एक पहर के सपने में घूम रहा था
By Anubha Sinha

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