एक टुकड़ा काँच का
By Anisha
एक टुकड़ा काँच का
चुभ जाए गर हाथ में,
कितना रक्त बहाता है।
कितनी पीड़ा होती है,
यह हाथ भी फिर
काम नहीं कर पाता है।
एक टुकड़ा काँच का
चुभ जाए गर पाँव में,
तुम चल भी नहीं पाते हो।
बैठ एक ही स्थान पर
पीड़ा से चिल्लाते हो,
कभी गिर भी जाते हो।
एक टुकड़ा काँच का
चुभ जाए गर हृदय में,
तुम कुछ कह नहीं पाते हो।
असहनीय पीड़ा का वह क्षण
तुम अकेले सह नहीं पाते हो।
मगर तभी सही अर्थों में
तुम सत्य को देख पाते हो।
एक टुकड़ा काँच का
हर कोई दिल में लिए फिरता है,
चुभन को छिपाकर उसकी,
ऊपर से मुस्कुराता फिरता है।
यह टुकड़ा निकालकर धीरे से,
किसी के दिल को गर सहला सको,
अकेला नहीं है वह इस पीड़ा में,
उसे यह बतला सको,
तो टुकड़ा तुम्हारा काँच का
स्वतः ही निकल जाएगा,
पीड़ा नहीं देगा अब वह तुम्हें,
दर्पण बनकर तुमसे
तुम्हारा परिचय करवाएगा।
वह अथाह प्रेम जो समाया है तुममें,
उससे तुम्हें अवगत करा जाएगा।
By Anisha

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