एक छोटा सा कमरा
By Ankit Malhotra
एक छोटा सा कमरा है,
हस्ते ख्यालों का कतरा है
एक सुखद सा बिस्तर है,
कुछ सोचता सा जिस पर है,
पढ़ी - अनपढ़ी किताबे हैं
दास्तानें जिनमें से झांके हैं
परदे के पीछे छिपी खिड़की है,
कुछ आती सी यादें किसिकी हैं,
किस को इनमें से दफा करूं
इस में घमों को कहां बसेरा दूं...
कभी कोई चंचल सी हसी,
कई बातें हैं इस कमरे में बसी,
अपनों का आना जाना रहता है
हर पन्ना कुछ कुछ कहता है,
एक कलम है, जो चलती जाती है
अपने हाव भाव बदलती जाती है
मिट्टी से भरे जूते बक्से में पड़े हैं
बचपन के कई राज़ इनमें गढ़े हैं
इन में किस बात को तू - तेरा कहूं?
इस में घमों को कहां बसेरा दूं...
हर त्यौहार, हर मौसम इसमें है कहीं
छुपे हुए कोनों में हवाएं गुम हैं कहीं
मां की डांट, उनका दुलार है कहीं
पापा के चिल्लाने की आवाज़ है कहीं
ठंडी हुई सब्जियों की गंध है कहीं
ज़ोर से किया दरवाज़ा बंद है कहीं
इस दरवाजे के अंदर बातें छुपी हैं कहीं
इन में छुपा मैं खुद, मेरी खुशी है कहीं
कई बरस की खुशी को कैसे अकेला करूं
इस कमरे में घमों को कहां बसेरा दूं...
By Ankit Malhotra

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