एक गुबार
By Gurnam
ऐ रब!
मुझे आज अभी इसी पल से,
निकाल ले इस दलदल से।
तेरी बनाई है दुनिया इसलिए अब तक चुप रहा,
वरना गालियां दी है मैंने दिल से।
कौन सच्चे हैं? धर्म के रखवाले, सरकार या कानून!
मैने हाथ मिलाते देखें हें कातिल से!
बुरा यह नहीं कि दुनिया बुरी है,
बुरा तो यह है कि तुम अच्छे हो तो कहाँ अच्छे हो!
इबादत, शिद्दत, बंदगी, पूजा-पाठ, नाम के रह गए मेरे लिए,
बस नफरत में ही लिख रहा हूंँ आजकल से!
आख़िर अपनी चौखट पर ही बुलाकर तू सवाल करेगा!
तो मेरा स्वाल है कि तूने धकेला ही क्यों था चौखट से?
जलती हुई बहुएँ, बिकती हुई बेटियाँ, भूख से तड़पते अनाथ बच्चे,
और बच्चों को रोते अपाहिज मां-बाप!
क्या तुम्हें नजर नहीं आते?
सुना है तू सब जान लेता है आहट से,
जितनी बातें करूंगा जहर ही उगलूंगा,
ख़तम कर कहानी फटाफट से मेरी झट से!
By Gurnam

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