एक ख्वाहिश
By Vani Bansal
क्या मैं तुम्हारे लिये वह बिन बारिश के मौसम की बर्सात थी
या फ़िर पेड के टूटे हुए पत्ते की तरह बस उडती हुई एक ख्वाहिश?
शाम को साथ बैठके बिताये हुए वह सारे पल
तुम्हारा मेरे बालों पर मेरे चेहरे पर हाथ फ़ेरना
मेरे माथे की शिकन को अपने अन्गूठे से हटा देना
और कहना, “यह शाम मैं कभी नहीं भूलुंगा”
और मेर मुस्कुरा कर तुम्हारी बातों को नकार देना
और कहना
“मैं बस इस शाम तुम्हारे साथ हूं, तुम्हारे वक्त की मैं हकदार नहीं”
तुम्हें याद है? जब पूरी रात मुझे कर्वटें बदलते देख
तुमने अपनी नीन्द को पुरानी किताबों की तरह पीछे छोड
मेरा हाथ थामे वह शान्त रात नई पुरानी बातों के शोर में खर्च कर दी
और कैसे मैं तुम्हारे ऊपर सर रखकर यूं सो गयी
जैसे कभी माँ मुझे गोद में भर सुलाया करती थी
अंजान बेखौफ़ सुकून के वह पल जहाँ
तुम अंजान कुछ कम और अपने थोडे ज़्यादा थे
मेरा बार-बार तुम्हें टटोलना और पूछना
“क्या खास बात है मुझमें, क्यूँ मैं तुम्हें भा गयी?”
और तुम्हारा हर बार की तरह वही सवाल का जवाब देते देते थक जाना
इस बार सिर्फ़ मुस्कुराना और कहना, “इस सवाल का मेरे पास भी जवाब नहीं”
और मेर तुम्हारी आन्खों मे उस पूछे हुए सवाल का जवाब ढूंढना
क्यूंकि शायद मुझे भी पता था और तुम्हें भी
कि वह शाम उस पुराने खत की तरह थी
जो आज भी स्याही से अपना पता पूछ रहा है
क्या मैं तुम्हारे लिये वह बिन बारिश के मौसम की बर्सात थी
या फ़िर पेड के टूटे हुए पत्ते की तरह बस उडती हुई एक ख्वाहिश
जो सिर्फ़ उस एक पल के लिए तुम्हारी थी और अगले पल वह नज़रों से ओझल हो गयी
By Vani Bansal

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