ऊंची उड़ान
By Praveen Kumar Das
आत्मविश्वास के बल पर लड़े जा रहा हूं मैं
है तपस्या का फल आगे बढ़े जा रहा हूं मैं
उड़ने के लिए चाहिए आत्मबल केवल
पर नहीं मेरे पर, परे जा रहा हूं मैं
उड़े जा रहा हूं, आगे बढ़े जा रहा हूं मैं
अपनी माटी पर, नाम स्वयं का गढ़े जा रहा हूं मैं ।
अर्पण है तुझको धरती कण कण मेरे स्वेद का
दाग ना लगे लिबास पर जिसका रंग सफेद का
हूं जो शांत शिष्ट सा कैसे उड़ा इतनी तेज मैं
अनुमान लगा नहीं होगा किसी को मेरे वेग का
मस्तक चाहे हो अंबर, पांव माटी पर अब भी है,
शत्रुओं की अधिकता हो, मुस्कुराते होठ तब भी है,
सफलता से संतुष्ट हो जाने वालों पर दोष है,
आजीवन लड़ते रहना निरंतर, यही युद्ध घोष है,
उड़ोगे तुम भी उस दिन, जिस दिन हवा को मोड़ लाओगे
तुम भी परिंदो की तरह अपने बाजुओं में पँख लगाओगे,
आओगे हवाओं के संग, फिर तुम भी उड़ पाओगे,
मुश्किलों से लड़ोगे एक दिन तुम भी परिंदे बन जाओगे ।
उस दिन फिर मेरे साथ तुम भी यही दोहराओगे,
आत्मविश्वास के बल पर लड़े जा रहा हूं मैं
है तपस्या का फल आगे बढ़े जा रहा हूं मैं
उड़ने के लिए चाहिए आत्मबल केवल
पर नहीं मेरे पर, परे जा रहा हूं मैं
उड़े जा रहा हूं, आगे बढ़े जा रहा हूं मैं
अपनीमाटीपर, नामस्वयंकागढ़ेजारहाहूंमैं।
By Praveen Kumar Das

Comments