उस रोज़
By Pushkal Sinha
तुम आना उस रोज़,
उजाला जब रातों का नतीजा होगा ।
गर्म अंगार जब सर्द राहत देंगे,
जिस रोज़ मदहोश होना,
होना संजीदा होगा ।।
जिस रोज़ समंदर थम सा जाएगा,
और सवेरे पर चांद की आहट होगी ।
तुम आना, जब बादलों से बरसेंगे सितारे,
पर उनमें चमक सिर्फ तेरी होगी ।।
सलीका जंग का जिस रोज़ मोहब्बत हो जाएगी,
जब उल्फतें सारी बेखौफ कर दी जाएंगी ।
लहू भी महकेगा गुलाबों सा जिस दिन,
तुम आना जब सारी रियासतें एक कर दी जाएंगी ।।
जश्न चुप चाप, जनाज़ों में शोर होगा,
चर्चा सादगी और हया का हर ओर होगा ।
न दर्द होंगे, न गम, न बेहाली होगी,
हकीकतों पर ख्वाबों का ज़रा ज़ोर होगा ।।
बदनसीबों को चाहत जब नसीब हो जाएगी,
जिंदगी जिस रोज़ मौत से लौट आएगी ।
तकदीरों को लिखेगा खुद इन्सा जिस दिन,
तुम आना, जब जवानी बुजुर्गी के बाद आएगी ।।
जिस रोज़ खुदा को जमीं पर उतारा जाएगा,
और इबादत का नया सबब बतलाया जाएगा ।
सरकशी भी होगी, पर इनायातों से,
तुम आना जब कयामत का किस्सा लिखा जाएगा ।।
By Pushkal Sinha

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