उलझन भूत भविष्य की
By Veena Agrawal
यादें और कल्पना दोनों ही,
आज की बाधा बनती है।
उलझ गए क्यूं भूत भविष्य में,
अपना आज सुधारे हम।
सुख-दुख दोनों ही,
जीवन के पहिए होते हैं।
भूत के वही पल चाहते हम
स्मृति पटल पर होते हैं।
भूत को ही गढ़ता क्यूं मन
कल्पना में खो जाता है।
छोटी सी स्मृति भूत की,
मकड़जाल पिरोती है।
अवरुद्ध होती गति कि,
आज का क्षरण कर लेती है।
भूत हमारा पूर्वजन्म है,
भविष्य भावी जीवन है हमारा।
दोनों के चक्रव्यूह से निकलकर,
बनता व्यक्तित्व हमारा।
राग-द्वेष भी यादों के कारण,
मन में द्वेष जगाते हैं।
क्यों याद करें उस पल को हम,
जो हमें दुखी कर जाते हैं।
आज हुआ सुदृढ़ जो हमारा,
कल खुद ही सुदृढ़ हो जाएगा।
निकलकर इस भूत भविष्य से,
आओ अपना आज सुधारे हम।
By Veena Agrawal

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