उम्मीदों का मर जाना ही है ज़िन्दगी
Updated: Dec 5, 2022
By Dr. Shahina Praveen
जब हो जाती कोई अनहोनी
या बर आता कोई हादसा
जब दीखता नहीं कोई भी
आगे जाने का रास्ता।
पर दिल न मानने को तैयार
हौसला न हारने को बेहाल
क़िस्मत से लड़ने की है ज़िद
इसी में गुज़रे रात और दीन।
दर दर ठोकर हैं खाते
मन्नत की चादर भी चढ़ाते
नाउम्मीदी का तमाचा
हैं फिर भी मुँह पर खाते।
जब न बचती कोई उम्मीद
न बचता कोई भी आस
बेबस ले कर रह जाते
अपने पास अपना हाल।
ये बात सुनते हम आए हैं
मौत क्या है? उम्मीदों का मर जाना
जब उम्मीदें ही मर गई हैं
ज़िन्दगी क्या है? फिर कैसे है जीना?
ख़ुद पे काबू हैं पाते
शिकवा शिकायतें सब ठुकराते
आँखों में ले आँखें डाल
खुद से करते आँखें चार।
जब कल नहीं, न कोई आस
डरने की फिर क्या है बात
हम आँच कभी न आने देंगे
जो पास बचा है मेरा आज।
इस सोच को जब अपनाते
झूटी उम्मीदों को दफ़नाते
ये राज़ अयाँ होता तभी
आज में जीना ही है ज़िन्दगी।
न रहती कोई होड़
न रहता कोई भागमभाग
न फेल होने का डर
न फ़िक्र 'क्या हम होंगे पास'?
न कोसते क्या क्या नहीं है
सँभालते जो जो सही है
कमतरी में नही जीते हैं
शुकरन की घूँट पीते हैं।
जब कामों से नहीं होता नाम
सारे मास्क हटा होती पहचान
रूह से रूह की होती रूबरू
हर शे दीखता है बेमिसाल।
कल की न कोई बात, केवल आज
न फ़िक्र की कोई ज़िक्र, हैं आज़ाद
न ख्वाहिशें, न कोई भी सवाल
न ख़ौफ़-ए-जवाल, न सर ग़ुरूर सवार।
न लालच, न कोई तिश्नगी
ख़ौफ़ व ख़्वाबों की न आवारगी
हर पल जीना ही है बंदिगी
उम्मीदों का मर जाना ही है ज़िन्दगी।
By Dr. Shahina Praveen

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