उम्मीद
By Amit Kanthi
रात की काली चादर ओढे,
स्वप्नों की चंद लतायें खोले,
मैं नित नयी सवेर का आवाहन करता हूँ,
मैं हर सुबह में उम्मीद जगाये रख़ता हूँ|
नित्य नये कोलाहल हैं,
चिर प्राचीन उनकी भाषा है,
पर नित नये मैं आश्वासन देता हूँ,
मैं हर सुबह् में उम्मीद जगाये रख़ता हूँ|
मैं नित्य ही खुद से चिंतित हूँ,
अनंत मेरा स्वरूप है,
अनिश्चित मेरी परिभाषा,
हूँ ख़ुद से मैं अंजान फ़िर भी मगर,
मैं हर सुबह में उम्मीद जगाये रख़ता हूँ|
By Amit Kanthi

Comments