उपहास ..
By Dr. Suboohi Jafar
उपहास और अट्टहास,
वैसे तो ये बहुत ही साधारण से शब्द लगते हैं,
किन्तु अक्सर, ये बहुत ही गहरे आघात दे जाते हैं,
ऐसा आघात, जो जीवन भर का दर्द दे जाता है,
जब- जब याद आए, तो आँखों में अश्रु दे जाता है,
और कभी अधरों पर एक व्यंगात्मक मुस्कान छोड़ जाता है|
जिस प्रकार मधुमक्खी फूल का सारा रसपान कर उसे छोड़ देती है,
काँटों के मध्य बिलकुल अकेला, निसहाय, मुर्झाया हुआ,
ठीक उसी प्रकार, उपहास भी मनुष्य को अंदर तक तोड़ देता है|
लोग उपहास बनाते हैं,
किसी के रहन- सहन, शारीरिक संरचना का,
हाव- भाव, जाति भाषा, पहनावा, संस्कृति का,
या फिर किसी व्यक्तिगत तथ्य के विषय में,
यह सोचे बिना कि उस व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है?
वो किस पीड़ा से जूझ रहा है?
उस उपहास से वह व्यक्ति और कितना आहत हो रहा है?
लेकिन प्रश्न तो यह उठता है, कि लोग उपहास करते क्यों हैं?
इसका उत्तर बहुत ही सरल है...
कई बार तो अपनी कमियाँ छुपाने के लिए,
ख़ुद पर से लोगों का ध्यान हटाने के लिए,
या स्वयं को श्रेष्ठ जताने के लिए,
दूसरों का उपहास करते हैं|
और कभी- कभी तो मैंने ये भी देखा है,
कि ईर्ष्यावश भी उपहास किया जाता है,
पर- पीड़ा में आनंदित होने के लिए भी उपहास किया जाता है|
लेकिन समझना पड़ेगा,
कि हँसी- मज़ाक और उपहास में अंतर है,
हँसी- मज़ाक का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना या अपमानित करना नहीं होता,
वह तो केवल आनंद लाता है, नीरसता को दूर भगाता है|
याद रखो, दुर्योधन और दुःशासन का अंत,
या फिर द्रौपदी द्वारा दुर्योधन के उपहास का अंत,
या मगध नरेश नन्द द्वारा आचार्य चाणक्य के उपहास का अंत,
उपहास से कोई भी सफल या आनंदित नहीं होता,
अंततः विनाश की ओर ही जाता है,
यह उस आंधी के समान है,
जोअपनेसाथकेवलधूलहीलाताहै|
By Dr. Suboohi Jafar

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