उच्चतम
By Aeshwarya Singh
हरि नाम जपे जहाँ वृक्ष-पवन भी,
पक्षी-पक्षी ॐ जपे,
भूमि जहाँ की सदैव चमकती,
जिसके-शत्रु मस्तक काँप-कपें।
चिंघाड़े जहाँ गगन उदय का
ऋषि मूनियों के भजनों से,
यह राम जन्म की पावन भूमि
सजी है वीरों के भालों से।
तप श्रवण करें, तब भ्रमण करें
जनक जननी तीर्थ स्थलों का।
यहाँ मिट्टी में ऐसा प्रेम मिला है,
कुकर्म बोझ हुआ यूँही हल्का।
शीतल ज्वाला तक मिलती है
मात्र भूमि की गोद में,
माँ सीता का स्वर मिलता है
कुरीतियों के विरोध में।
दुर्गा मैया तलवारों में,
सरस्वती-आलय कंठ है।
काली मैया अँगारों में,
लक्ष्मी माँ यह अँग हैं।
कण-कण में गीत हैं सुखदायी,
मिश्रित गुरुओं की वाणी के।
पूरे भारत में रीत चल-आई,
है रीत बहुत पुरानी वे।
By Aeshwarya Singh

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