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इश्क़ के रंग

Jan 15, 2025
1 min read

By Arsh Raz



सुन ए मुसाफ़िर प्यार के

एक दास्ताँ तू आज सुन ।

तू सुन लब्ज़ मेरी दिलकशी के

एक कारवा तू आज सुन ।


जिस उन्स की तू बात करता

क्या वो दिल की आदत बन चुका ।

हां बन चुका तो शहादत दे

की नैन उसकी रियाज़त में नम शुदा ।


तो अब उस अनोखी एहसासत में

तू इश्क की ज्योती जला ।

और अकीदत रख ले प्यार पर

जो न मिला, वो अब मिला ।


हां कर इबादत महबूब से

और एक दास्ताँ उसको सुना ।

की उसे कितनी जुनूनियत से चाहा था

और उसमें तू कितना फ़ना ।


की मौत ही अब आखिरी है

तेरे और उसके दरमिया ।

हां अधूरा है तो क्या हुआ

यें अधूरी सुर्खियां।


By Arsh Raz




 
 
 

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