“इन्तज़ार”
By Shovit Raj
इन्तज़ार तुम्हारा है तब तक,
जब तक है तू बाक़ी मुझमें!
सुबह की सूरज की रोशनी,
जब बिखरेगी घर के आँगन में!
चरियों की सुरुली चाचहात
जब गूँजेंगे मेरे इन कानो में!
शहरों के सारे शोर-शराबे,
जब कहेंगे मुझे कुछ अकेले में !
इक तेरे प्यार की डोरी खिंचेंगीं मुझे,
जब ढलते शाम की बाहों में!
इन्तज़ार तुम्हारा है तब तक ,
जब तक है तू बाक़ी मुझमें !
जब शहर ये सारा सो जाता था ,
तब मैं ही तो तेरे हर क़िस्से-
कहानियों को सुना करता था!
तेरे आँखों में आए आँसुयो को
मैं ही तेरे होंठो की हँसी में
बदला करता था !
चेहरे पे आए तेरे इन काली ज़ुल्फ़ों
को मैं ही तो सँवारा करता था!
वो फूलों के बाग़ बगीचों में
तेरा हाथ थाम कर
लग जा ग़ले
तेरे लिए मैं ही तो गाया करता था !
बात बहुत आसान था ,
मुझे तुमपे गुमान था !
तू, दिल में बस्ते थे इसलिए ,
तुम्हें सच्चा बता मैं
अपने दोस्तों से भी लड़ जाया करता था!
पर तेरे जाने के बाद ,
जब मैं रोया , रूठा ,
अकेले में ही ख़ुद से ही
ख़ुद ही में टूटा ,
तब मुझे मालूम चला की,
मैं तो एक ग़लतफ़हमी का शिकार था!
चलो माना की कई ऐब है मुझमें
माना की अभिमान है मुझमें ,
मालूम हैं मुझे मेरे ना पूरे किए
गए वादों का सच ,
जो तुझसे किए थे मैंने !
पर् तू भी तो देख ,
मेरी उस छुपी हुई हिम्मत को ,
जो उन वादों को पूरा करने
के लिए किए थे मैंने!
तू जैसी थी वैसे ही तुझे
अपनाया था मैंने ,
बदले में कुछ पाने की तुझसे
एक उम्मीद भी ना लगाया था मैंने ,
रख के सर तेरे गोदी में,
एक ख़्वाब संजोया था मैंने ,
कर के मोहब्बत तेरी रूह से
तुझे अपने दिल में बसाया था मैंने !
इन्तज़ार तुम्हारा है तब तक
जब तक है तू बाक़ी मुझमें !
(शोभित राज सिन्हा)
By Shovit Raj

Comments