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इक ग़ज़ल ही तो हो तुम कोई

Nov 25, 2022
2 min read

By Khayaal (Motilal Parakh)


इक ग़ज़ल ही तो हो तुम कोई,

उर्दू में लिपटी हुई, सुरों में बंधी,

किसी खूबसूरत राग से निकली,

किसी मद्धम सी ताल में सजी,

बड़ी नजाकत से यूँ उतरी होगी,

तुम कोरे पन्नों में गीत भरने को,

कोई शायर के दिल का वो हाल,

जाने कितने तरसे होंगे गाने को,

जो आ जाओ तुम जुबां पे कभी,

कुछ मिठास सी छोड़ जाती हो,

इक ग़ज़ल ही तो हो तुम कोई,

बस युहीं दिल में उतर जाती हो।





कहानीयां कई सुनी है परियों की,

पर सब हकीकत से परे ही लगी,

लगा ये बचपने की बेतुकी बातें है,

फिर अचानक ज़िन्दगी को तू मिली,

मुझे परियों पे ऐतबार सा होने लगा,

पहले वहम फिर प्यार सा होने लगा,

हाँ तुमको पर नहीं, मैं ये जानता हूँ,

तुने ओढ़ा वो लिबाज़ नहीं, मानता हूँ

पर फिर भी तुम उड़ती हो आसमां में,

लगती कमाल हो तुम अपने आप में,

आँखों से करके अब हर बात युहीं,

तुम कोई जादूगरी नज़र आती हो,

इक ग़ज़ल ही तो हो तुम कोई,

बस युहीं दिल में उतर जाती हो।


ये एहसास कभी हुआ नहीं पहले,

शायद इस मुलाकात का असर है,

दिल-ओ-दिमाग बस तेरा ख़याल,

ये खुदा का कैसा अजब कहर है,

तुम इक हवा सी ही तो गुज़री थी,

फिर इश्क की सर्दी कैसे लग गयी,

तुम इक सवाल हो या पहेली कोई,

जो उलझी, बस उलझती ही गयी,

हाँ तुमसे नज़रें हटाई नहीं जाती,

ज़िन्दगी से तेरी खुशबू नहीं जाती,

कुछ यूँ मदहोश आलम है दिल का,

बगैर तेरे कमबख्त नींद नहीं आती,

तुम बीती शाम की सहर हो कोई,

तुम मुझे मेरी नींद नज़र आती हो,

इक ग़ज़ल हो तो हो तुम कोई,

बस युहीं दिल में उतर जाती हो।


By Khayaal (Motilal Parakh)





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