इक सपना
By Neelam Jha
देखा मैंने इक सपना
चढ़ी यान, पहुँची आसमान में
अंतरिक्ष यान से नीली धरती
लग रही थी अति सुन्दर!
धीरे-धीरे अवनि तक पहुँची
जैसे-जैसे पहुँची निकट,
लड़ते-भिड़ते लोग दिखे
कुछ धर्म के नाम पर,
कुछ जाति की आन पर
कुछ ज़मीन के टुकड़े पर,
कुछ थोथे अभिमान पर,
मानव ही मानव चहुँ और दिखे ,
पर नहीं दिखी मानवताA
जो मिलकर ये रहते,
तो धरती दिव्यलोक बन जातीA
पर यहाँ तो
मानव दानव सदृश लगने लगे
ओह! हर ओर दानव...
अंतर्मन लगा पूछने
प्रेम-स्नेह अनिवार्य गुण जीवन के
कैसे इसे हम भूल गए ?
लगी जो ढूँढने उत्तर प्रश्न का
कि नींद खुल गई
अच्छा जो मैंने देखा,
था वो इक सपना !
पर क्या नहीं है वो सपना सच्चा\ मन अपना ये प्रश्न पूछता है बारम्बार
By Neelam Jha

Comments