इक बार फिर
By Sarita Gari
इक बार फिर आओ ना
वहीं...उस नदी के तीरे
जहाँ पवन बहती है धीरे धीरे
वो शोर कल कल का करती
कोरी वो नदी उछल कर जो बहती
कभी उमड़ती कभी घुमड़ती
कभी लहराकर जो ठुमकती
चल पड़ी देखो कैसे
अपने सागर से वो मिलने
खुश हो जैसे अब कह देगी मिलकर
समेटे रखा जो अब तलक अनकहे जज्बात दिल में
इक बार फिर आओ न "जाना"
उन अनकहे जज्बातों को कह जाने को
दो पल बैठे हम भी कि कहनी है मुझे भी
कई अनकही बातें इस दिल की उन सभी बातों को सुन जाने को
इक बार फिर आओ ना
उस पहाड़ी के नीचे
जहां हर पत्थरों पर हैं हमारे किस्सों के कुछ हिस्से
वहां ऊँचे वो पहाड़, जो समेटे हुए आज भी
हमारी वो खिलखिलाहट वो ठहाकों वाली हंसी
उन ऊँचे चट्टानो सा दृढ़ हमारा ये प्रणय बंधन
तेरी पनाहों में महसूस होता मुझे वो हृदय स्पंदन
पहाड़ों के हसीन नज़ारों सा
ये रिश्ता भी जो हसीन हुआ था
उस क्षितिज़ पर हमारे मोहब्बत का
ये रंग भी तो रंगीन हुआ था
कि इक बार फिर आओ न "जाना"
उसी पहाड़ी के नीचे
उस चट्टान पर बैठे दो पल हम भी
कि फिर से मुझे दोहरानी हैं वो कसमें
इक बार फिर आओ ना
उस पीपल की छाँव
अंत होता हुआ जहां मेरा ये गांव
पीपल की उस डाल जहां चिडा-चिरैया का डेरा था
उस डाल के नीचे ही कहीं तेरा-मेरा भी तो बसेरा था
बैठ उस छाँव हम वो कच्ची अमिया खाते थे
तुम केशों को मेरे महकते गजरे से सज़ाते थे
वहीं बैठ देखा करते थे ढलता हुआ वो पहर
संध्या से रात्रि की मिलन की वो सुहानी सी बेला
तेरा हाथ थाम वो लम्हा जाता था गुजर
और वो छटा आनंदित करता लगता कितना ही अलबेला
हां इक बार फिर आओ न "जाना"
उसी गाँव वही पीपल की छाँव
कि उस पन्ने पर पूरी लिखनी है
मुझे अपनी अधूरी सी वो कहानी....
By Sarita Gari

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