इक अलबेला शहर।।…
By Abhimanyu Bakshi
अलबेले किसी शहर मेरे पाँव ले चलो,
ऐसा करो मुझे इस बार गाँव ले चलो।
गाड़ी को आराम दो शहर में रहने दो,
वहाँ नदियाँ भी जाती हैं, तो नाव ले चलो।
आदमी की जड़ें आज भी वहीं मौजूद हैं,
तरक़्क़ी से ज़ेहन पर लगे सब घाव ले चलो।
कुओं में खेतों में बहुत ख़ाली जगह है,
इसलिए ज़िंदगी के सारे तनाव ले चलो।
शहरों में धूप तो काफ़ी लगने लगी है अब,
गाँव से पीपल की ज़रा सी छाँव ले चलो।
वाई-फ़ाई तो कभी-कभी बिगड़ भी जाता है,
महफ़िल जमाने के लिए यहाँ से अलाव ले चलो।
हमारा भी आफ़ताब निकले तो कई पंछी चहकें,
कुदरत को निखारने का चाव ले चलो।
मनु बस पेटियाँ अमरूदों की न रखो गाड़ी में,
जाते-जाते दादी-माँ से कोई सुझाव ले चलो।
By Abhimanyu Bakshi

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