इक अजनबी
By Shivpriya Khude
अंजान हो कर भी
कुछ अपना सा लग रहा था
क्या पता किधर जा रहा था...
लेकीन बार बार ऐसे लग रहा था
ना जाने क्युं.. जा ना पेहचाना लग रहा था…
सोचते सोचते पता ही नही चला
कब उसकी नज़र मेरी नज़र से मिली
वो थोड़ा सा इतराया मैं थोड़ी सी
शरमायी...
वो थोड़ा हलका सा मुस्कराया
मैं उस मे खो गयी..
इस चक्कर मैं वो कब सामने आया पता ही नहीं चला
मैं थोड़ा घबरायी,वो थोड़ा सा नरमाया..
उसनें कुछ पूछा, मैंने कुछ कहा
करते करते बहोत बात कर गये..
बितते बितते बहोत समय बीत गया
पता नहीं चला कब वक़्त हों गया..
रुकते हुवे उसने पूछा
फिर कब मिलोगी?
मैंने कहा जब फिरसे रास्ते मिलेंगे..
अपना सा होते होते फिर से अंजान हो गया
चलते चलते हम दो अलग रास्ते चले गये..
बिना इक दूसरे से पूछे
नाम क्या हैं तुम्हारा.. बस चलते गये...
By Shivpriya Khude

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