इंतज़ार
By Kavya Mehulkumar Mehta
इंतज़ार करते-करते साल बीत गए,
बसंत भी गया, पावस भी गया,
न वो आया, न उसका कोई पैग़ाम।
बैठे रहे हम वहीं,
इंतज़ार करते-करते।
जाप उसका करते रहे ,
इस आस में कि कभी तो वो लौटे।
लेकिन रोज मिले मायूसी से ,
आज भी जब ज़िक्र उसका होता है,
आँखें हो जाती है नम हमारी ।।
पर यह कम्बख्त दिल न मने,
उस का इंतज़ार आज भी करे ।
By Kavya Mehulkumar Mehta

Very Deep thinking and emotional touch
इन्टज़ार की पीड़ा और सच्चे भाव को बहुत गहराई से व्यक्त करती हैं।
समय, ऋतुएँ और परिस्थितियाँ बदलती रहीं, लेकिन भावनाओं की सच्चाई बनी रही — यही इस रचना की खूबसूरती है।एक भावपूर्ण और दिल को छू लेने वाली रचना।
So thoughtful of you Kavya. Keep writing
You have captured a universal feeling in a very personal way. Keep writing
Excellent 👌 👌