आशिकों की जमात
By Aditya Mishra
मै थूकता हूँ उनपर जो, होठ चूमने को इश्क बताते है,
मै कोसता हूँ उनको जो, माथा चूमकर प्रेम जताते है,
इश्क से मेरे वस्ल एक पवित्र मंज़र हो जाता है
शरीर जब उनका एक पाक मंदिर हो जाता है
इबादत में जैसे कोई काज़ी हज घूमता है
बेखुदी मे जैसे कोई दीवाना दरविश झूमता है
इश्क मेरा ठीक वैसे ही, उनके पाँव जाकर चूमता है
झूठी आशिकी में हमेशा सदका जरा कम है...
बाँते बहुत सी ही लेकिन, इश्क में कहाँ दम है?
इन लुटेरों की वाहवाही कम ही हो तो अच्छा है
आशिकों के किस्से वहीं प्रचलित हो, जिनमे इश्क साबुत सच्चा है।
By Aditya Mishra

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