आलम के किसी कोने से।।…
By Abhimanyu Bakshi
मैंने आँखें खोली हैं जबसे,
इक जैसा मंज़र पेश-ए-नज़र रहा…
किसी नाख़ुदा के इशारों पर,
किसी ओझल शहंशाह के इशारों पर…
कुछ कठपुतलियाँ नाच रही थीं।
इन कठपुतलियों में कुछ बड़ी दिलचस्प सी बातें हैं…
ये जज़्बातों से बनीं हैं…
शदीद, कमज़ोर, ख़ुश-मिज़ाज, मंफ़ी…
हर तरह के जज़्बातों से।
पर जैसे-जैसे मुसलसल वक़्त गुज़रता रहा,
इक अलग सा साया इनके ऊपर छाने लगा…
साया, अपनी हस्ती का, झूठ का, आत्म-सम्मान का,
साया, मतलब का, मुक़ाबले का, ख़ुद पे गुमान का।
ये साया, घना होता रहा,
हो रहा है, न जाने कब ख़त्म होगा…
क्योंकि, इस साए में कहीं…
डोरियाँ खो सी गईं हैं…
नाख़ुदा तो अब भी है, शहंशाह ता-हाल हुकूमत में है,
बस कठपुतलियाँ मन-मर्ज़ी करती हैं।
अक्सर अपनी ही चाल चलने लगती हैं,
ख़ुद-गरज़ी की धुँधली सी राहों पर…
गुमान की टेढ़ी-मेढ़ी चाल।
कुछ टूट जाती हैं, कुछ संभल जाती हैं।
जो टूट गईं, फ़ना हो गई…
संभलने वाली, मरहले की शान हो गईं।
…ऐब, फ़रेब, छल-कपट के साए में,
अच्छाइयों के निशान भी मुंताशीर हैं…
…है सच-ओ-विश्वास के भी निशान यहाँ,
मगर अफ़सोस, थोड़े कम हैं।
…पर है हैरत-अंगेज़ इक बात,
मुझे ताज्जुब है, उस नाख़ुदा से सवाल है,
तुम्हें भी होना चाहिए, गौर करोगे तो होगा… हरगिज़ होगा…
…इस मरहले पर, सब कुछ है,
कुछ अच्छा, कुछ बुरा, सब कुछ।
…पर फिर भी, आलम के किसी कोने से,
ये नज्म कमाल दिखता है, बेमिसाल लगता है,
शृंगारों से सजी किसी शर्माती दुल्हन,
के चेहरे का जमाल लगता है।
ये कैसे मुमकिन है कि कठपुतलियाँ,
सभी तो रंगीन नहीं, कुछ फीकी भी हैं…
पर फिर भी ये कैफ़ियत, ये मरहला,
लाजवाब लगता है… कैसे??…
By Abhimanyu Bakshi

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