आदमी (गीतिका प्र.सं10)
By Dr C M Gupta Atal
पदांत-रहा है आदमी,समान्त-ओ स्वर
मापनी-2122 2122 2122 212
आदमी (गीतिका)
आदमी की भीड़ में अब, खो रहा है आदमी।
आँख अपनी खोल कर के, सो रहा है आदमी। 1
गाँव शहरों में वफ़ा के, फूल अब कैसे खिलें।
नफरतों के बीज उनमें, बो रहा है आदमी।2
आज चिड़ियों के चहकने, की मना ही है जहाँ।
हाथ अपने आँसुओं से, धो रहा है आदमी। 3
जानवर को जानवर हम, क्यूँ कहें कैसे कहें।
जानवर तो आज खुद ही, हो रहा है आदमी। 4
मर गईं इंसान में अब, वेदना संवेदना।
सैकड़ों मन बोझ गम के, ढो रहा है आदमी।5
By Dr C M Gupta Atal

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